मिट्टी की गाथा
🌾 मिट्टी की गाथा
(पाँच पीढ़ियों की कहानी – माधो साह से रामानन्द साह तक)
लेखक अरविन्द कुमार
अध्याय 1 : धरती का बेटा (माधो साह)
सुबह का धुंधलका धीरे-धीरे मिट रहा था। गाँव की पगडंडी पर हल की लकड़ी की खटखट और बैलों की घंटियों की टुन-टुन सुनाई देने लगी। यह आवाज़ गाँव के हर इंसान के लिए एक परिचित धुन थी—क्योंकि यही खेतों का संगीत था।
माधो साह अपने हल-बैल लेकर खेत की ओर बढ़ रहे थे। उनके कंधे पर फावड़ा था, पैर में घिसी-पुरानी चप्पल और माथे पर पसीने की बूंदें। सूरज अभी निकला भी नहीं था, लेकिन उनकी मेहनत शुरू हो चुकी थी।
“चल रे मोती… चल रे सूरज…” – बैलों के नाम पुकारते हुए वे खेत में हल चलाने लगे। मिट्टी की गंध हवा में फैल गई। हल की धार जब गीली धरती को चीरती, तो ऐसा लगता जैसे धरती माँ अपने बच्चों को भोजन देने के लिए तैयार हो रही हो।
घर पर उनकी पत्नी भी जग चुकी थी। चूल्हे पर धुएँ के बीच मोटी-मोटी रोटियाँ सेंकी जा रही थीं। बेटा दौड़ता हुआ खेत पर आया –
“बाबा, माँ ने कहा है पहले खा लो, फिर काम करो।”
माधो साह मुस्कुराए –
“खा लूँगा बेटा। पहले धरती माँ को जगा दूँ। जब तक हल नहीं चलेगा, अन्न कैसे मिलेगा?”
गाँव के कुछ लोग खेत की मेड़ पर खड़े होकर बातें कर रहे थे।
“माधो, दिन-रात खेत में लगे रहते हो। कभी थकते नहीं?”
माधो साह ने हल सीधा करते हुए जवाब दिया –
“धरती माँ है। उसका पेट भरूँगा, तो मेरा भी भरेगा। किसान थक सकता है, लेकिन रुकेगा नहीं।”
शाम को जब वे घर लौटे तो चूल्हे पर बनी रोटी और प्याज उनका स्वागत कर रहे थे। बेटे ने शिकायत की –
“बाबा, गाँव के रामबली काका के घर रोज़ घी-चावल पकता है। हमारे घर में सिर्फ रोटी-प्याज क्यों?”
माधो साह ने बेटे के सिर पर हाथ रखा –
“बेटा, हमारे पास कम जमीन है, पर मेहनत ज्यादा है। याद रखना – मेहनत करने वाला कभी भूखा नहीं रहता। यह रोटी-प्याज हमारे लिए भगवान का प्रसाद है।”
उस रात जब सब सो गए, माधो साह आँगन में आसमान की ओर ताकते रहे। तारों भरा आकाश और मिट्टी की महक उनकी दुनिया थी। उन्होंने धीरे से कहा –
“हे धरती माँ, जब तक साँस है, तेरा साथ नहीं छोड़ूँगा।”
और सचमुच, उनका जीवन खेत, बैल और मिट्टी में ही घुल गया।
अध्याय 2 : संघर्ष की धूप-छाँव (मनी साह)
बरसात की बूंदें आकाश से झर-झर गिर रही थीं। आसमान में घने बादल छाए थे। खेतों में धान की हरियाली लहराती थी, लेकिन इस हरियाली के पीछे किसान के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें भी थीं।
माधो साह अब बूढ़े हो चुके थे। खेत की जिम्मेदारी धीरे-धीरे उनके बेटे मनी साह के कंधों पर आ गई थी।
मनी साह सुबह-सुबह बैलों को जोतकर खेत की ओर निकले। माँ ने पुकारा –
“बेटा, आज तो बारिश बहुत है, थोड़ी देर बाद जाना।”
मनी साह ने मुस्कुराकर कहा –
“अम्मा, किसान के लिए बारिश रुकने का इंतजार नहीं होता। खेत में पानी खड़ा हो जाएगा तो बुआई कैसे होगी?”
वे खेत पहुँचे तो देखा, कई जगह पानी भर गया है। बगल वाले खेत में खड़ा किसान बोला –
“मनी भैया, अबकी बार फसल का भरोसा नहीं। कभी सूखा तो कभी बाढ़।”
मनी साह ने गहरी साँस ली –
“किसान की जिंदगी धूप-छाँव जैसी है। कभी घाटा, कभी फायदा। पर खेत छोड़ देंगे तो जीना कैसे होगा?”
🌱 पशुओं का सहारा
दिन गुज़रते गए। फसल कभी अच्छी हुई, कभी चौपट हो गई। लेकिन मनी साह हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने खेत के साथ-साथ पशुपालन को भी अपनाया।
उनके आँगन में गाय, भैंस और बकरियाँ बंधीं रहतीं। सुबह-सुबह दूध दुहने की आवाज़ गली-मुहल्ले तक गूंजती।
पड़ोसी आते –
“मनी भैया, आधा लीटर दूध दे दीजिए।”
मनी साह हँसते हुए कहते –
“गाय हमारी माँ है। उसका दूध किसी को देने से घटता नहीं, आशीर्वाद बढ़ता है।”
यही पशु उनके परिवार की बड़ी ताकत बने। कभी खेत घाटे में गया तो दूध बेचकर घर चला लिया।
🌾 गाँव की पंचायत
गाँव में एक बार पंचायत बैठी। चर्चा का विषय था –
“खेती में मेहनत तो बहुत है, पर लाभ नहीं। अबके नौजवान शहर की ओर जा रहे हैं। मजदूरी करेंगे, पर खेत में पसीना नहीं बहाएँगे।”
सबकी नज़र मनी साह पर गई।
उन्होंने कहा –
“खेती घाटे का धंधा नहीं, धैर्य का धंधा है। अगर हम सब मिलकर मेहनत करें, पानी रोकने के उपाय करें, अच्छे बीज लगाएँ तो फसल अच्छी होगी। हमें खेत से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।”
उनकी बात सुनकर गाँव में कई किसानों का हौसला बढ़ा। लोग उन्हें सम्मान से “मनी भैया” कहकर पुकारने लगे।
🌌 घर की बातें
एक रात घर के आँगन में चाँदनी बिखरी थी। माधो साह चारपाई पर लेटे थे।
उन्होंने बेटे से कहा –
“मनी, मैंने जिंदगी भर खेत को पूजा। अब तुम संभालो। पर याद रखना, खेत को छोड़ना मत।”
मनी साह ने पिता के पैर दबाते हुए उत्तर दिया –
“बाबा, जब तक जान है, खेत और पशु ही मेरी दौलत रहेंगे।”
पत्नी पास बैठी सुन रही थी। उसने धीरे से कहा –
“हम गरीब सही, पर खेती और पशु से ही तो इज्जत है। यही हमारी दुनिया है।”
🌾 संघर्ष और विश्वास
वक्त गुज़रता गया। कभी ओला पड़ता, कभी फसल सूख जाती। कई बार कर्ज भी लेना पड़ा। पर मनी साह ने कभी हार नहीं मानी। वे अक्सर बच्चों को समझाते –
“बेटा, मेहनत से बड़ा कोई धन नहीं। चाहे कितना भी संकट आए, खेत और मेहनत कभी हमें भूखा नहीं रहने देंगे।”
उनकी आँखों में चमक थी—यह चमक मिट्टी पर अटूट विश्वास की थी।
अध्याय 3 : पसीने का सोना (फुल्चन साह)
गाँव में सावन का महीना था। चारों ओर हरियाली लहराती थी, तालाबों में पानी छलकता था और बच्चों के गीत खेतों तक गूँजते थे। इसी हरियाली के बीच, फुल्चन साह खेत की मेड़ पर खड़े होकर अपनी मेहनत का नज़ारा देख रहे थे।
वे मनी साह के बेटे थे और बचपन से ही हल-बैल के बीच पले-बढ़े। उनकी हथेलियों में छाले थे, मगर आँखों में सपने भी थे।
🌱 नई शुरुआत
फुल्चन साह के समय तक गाँव में कुछ बदलाव आ चुका था। कुएँ के साथ-साथ नहर बनी थी और पंपसेट का नाम भी गाँव में सुनाई देने लगा था।
एक दिन पड़ोसी ने उनसे कहा –
“फुल्चन भैया, अब तो पंपसेट आ गया है। बारिश का भरोसा नहीं, लेकिन मशीन से खेत सींचा जा सकता है।”
फुल्चन साह मुस्कुराए –
“अच्छा है। मशीन आई है तो मेहनत कम होगी। पर बेटा, ध्यान रखना – चाहे पंपसेट हो या नहर, मिट्टी तो अपने पसीने से ही उपज देती है।”
🐂 खेत और पशु
उनके घर में बैलों की आवाज़ सुबह-सुबह गूँजती रहती। बैलों के गले की घंटियों की टुन-टुन पूरे टोले को जगा देती।
गाँव के लोग कहते –
“फुल्चन साह बड़े कर्मठ किसान हैं। उनके खेत में हर साल अच्छी फसल होती है।”
फुल्चन साह अपने बच्चों को सिखाते –
“खेती सिर्फ हल चलाने से नहीं होती। खेत को समय पर पानी चाहिए, खाद चाहिए और सबसे जरूरी – किसान का पसीना चाहिए। पसीना ही असली सोना है।”
🌾 गाँव का नेता
धीरे-धीरे उनका अनुभव और मेहनत गाँव के लोगों को प्रभावित करने लगा। कोई किसान बीज खरीदने में असमर्थ होता तो फुल्चन साह उसे बीज बाँट देते। कोई हल न जुटा पाता तो वे अपने बैल दे देते।
एक दिन गाँव की चौपाल में पंचायत हुई।
लोग बोले –
“फुल्चन भाई, आप गाँव के सब किसानों का सहारा हो। आप बताइए, इस साल धान की खेती कैसे करेंगे?”
फुल्चन साह ने गंभीर स्वर में कहा –
“हम सब मिलकर खेतों में मेहनत करेंगे। अगर बारिश न हुई तो पंपसेट से सींचेंगे। लेकिन किसी भी हालत में खेती छोड़ेंगे नहीं। मिट्टी से नाता तोड़ने वाला किसान, किसान नहीं रहता।”
उनकी यह बात सुनकर सब किसानों का हौसला बढ़ा।
🌌 परिवार की दुनिया
रात को घर में पत्नी चूल्हे पर खाना बना रही थी। बच्चे आँगन में खेल रहे थे।
पत्नी बोली –
“आज गाँव की औरतें कह रही थीं कि तुम सबकी मदद करते-करते अपने घर का नुकसान कर लेते हो।”
फुल्चन साह ने हँसते हुए जवाब दिया –
“अरे, दूसरों के खेत हरे होंगे तो हमारा भी गाँव हरा होगा। किसान अकेले खुश नहीं रह सकता, खेत सामूहिक मेहनत से खिलते हैं।”
🌾 कठिनाइयाँ और उम्मीद
कभी फसल चौपट होती, कभी अनाज के दाम गिर जाते। कई बार कर्ज भी लेना पड़ता। लेकिन फुल्चन साह के चेहरे पर कभी मायूसी नहीं दिखी। वे कहते –
“मेहनत का पसीना कभी व्यर्थ नहीं जाता। खेत धोखा दे सकता है, पर मिट्टी नहीं। जब तक हम मेहनत करते रहेंगे, अन्न जरूर मिलेगा।”
उनकी यह अडिग आस्था ही गाँव की ताकत थी।
अध्याय 4 : गाँव और शहर के बीच (ईशर साह)
गाँव की गलियों में अब पुराने बैलगाड़ियों की जगह मोटरसाइकिलों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी थी। खेतों के किनारे लगे पुराने आम और पीपल के पेड़ अब भी खड़े थे, लेकिन गाँव की हवा में एक नई बेचैनी घुल गई थी।
ईशर साह, फुल्चन साह के बेटे, इन सब बदलावों को अपनी आँखों से देख रहे थे।
🌱 बचपन की यादें
ईशर साह बचपन से ही खेतों और बैलों के बीच बड़े हुए थे। उन्हें याद है, कैसे उनके पिता फुल्चन साह बैलों की घंटियों के साथ सुबह खेत निकल जाते और खेतों से लौटते समय गाँव के बच्चों के लिए गन्ना या अमरूद ले आते।
ईशर साह उस दौर को याद करके अक्सर कहते –
“तब गाँव ही दुनिया था। खेत ही रोज़गार थे। आज सब कुछ बदल रहा है।”
🌾 शहर की ओर रुझान
गाँव के नौजवान अब शहर जाने लगे थे। कोई मज़दूरी के लिए, कोई नौकरी की तलाश में।
एक दिन ईशर साह का छोटा भाई बोला –
“भैया, अब गाँव में क्या रखा है? शहर चलो। वहाँ पैसा है, रोशनी है, काम है। यहाँ खेत में जान खपाओ और बदले में दो वक़्त की रोटी भी मुश्किल।”
ईशर साह ने हल को कंधे पर रखते हुए कहा –
“शहर की रोशनी चमकदार है, लेकिन मिट्टी की खुशबू कहीं और नहीं मिलेगी।
हम गरीब हैं, लेकिन खेत छोड़ देंगे तो हमारी पहचान ही खत्म हो जाएगी।”
🐂 संघर्ष और लगाव
उन दिनों खेती आसान नहीं रही। कभी बारिश का समय बिगड़ जाता, तो कभी कीड़े फसल खा जाते। गाँव में कई किसान ज़मीन बेचकर शहर चले गए।
लेकिन ईशर साह का मन खेतों में ही बसता।
वे कहते –
“खेती में भूख है, प्यास है, पर यही जीवन है। अगर मिट्टी से रिश्ता तोड़ दिया, तो जैसे जड़ से पेड़ कट गया।”
🌌 पारिवारिक संवाद
एक शाम घर के आँगन में ईशर साह अपने बच्चों के साथ बैठे थे।
बड़ा बेटा बोला –
“बाबा, स्कूल में मास्टर जी कह रहे थे कि शहर में अच्छे कॉलेज हैं। मैं भी वहाँ पढ़ाई करना चाहता हूँ।”
ईशर साह ने कुछ देर सोचा और फिर बोले –
“बेटा, पढ़ाई ज़रूरी है। पर याद रखना, चाहे जहाँ पढ़ो, अपनी मिट्टी मत भूलना। यही मिट्टी हमारी असली पहचान है।”
पत्नी चूल्हे पर रोटी सेंकते हुए बोली –
“आप सही कहते हैं, लेकिन अब गाँव की दुनिया बदल रही है। बच्चे खेतों से दूर हो रहे हैं।”
ईशर साह ने गहरी साँस लेकर कहा –
“हाँ, लेकिन अगर हमारी पीढ़ी भी मिट्टी छोड़ देगी, तो ये गाँव सूना हो जाएगा।”
🌾 गाँव और शहर के बीच खड़े ईशर साह
समय बीतता गया। ईशर साह ने कई बार अपने भीतर खींचतान महसूस की—एक ओर खेत, दूसरी ओर शहर की चमक।
लेकिन अंत में उन्होंने वही चुना, जो उनके खून में था – खेती और गाँव।
वे अक्सर कहते –
“भले ही गाँव में गरीबी है, लेकिन यहाँ की मिट्टी की महक में जो सुकून है, वो शहर के महलों में कहाँ।”
🌾 मिट्टी की गाथा
अध्याय 5 : नई सुबह की खोज (रामानन्द साह)
गाँव की गलियों में अब बिजली के खंभे खड़े थे। रात को बल्ब जलते थे, बच्चे रेडियो सुनते थे और कहीं-कहीं टीवी भी आ गया था। यह वही गाँव था, जहाँ कभी सिर्फ ढिबरी की रोशनी जलती थी।
रामानन्द साह, ईशर साह के बेटे, इस नई सुबह का चेहरा थे। वे पढ़े-लिखे थे, लेकिन उनका मन शहर नहीं, बल्कि खेतों में बसता था।
🌱 पढ़ाई और खेती
रामानन्द साह गाँव के पहले नौजवान थे जिन्होंने मैट्रिक पास किया। सब लोग उन्हें समझाते –
“रामानन्द, अब पढ़ाई कर ली है, शहर चले जाओ। नौकरी करोगे तो पैसा आएगा।”
रामानन्द साह मुस्कुराकर कहते –
“नौकरी से पेट भरेगा, लेकिन आत्मा कैसे भरेगी? खेत हमें सिर्फ अन्न नहीं देता, हमारी पहचान भी देता है। मैं यहीं रहकर खेती को बदलूँगा।”
🚜 ट्रैक्टर की गड़गड़ाहट
एक दिन गाँव में सब लोग चकित रह गए जब रामानन्द साह ने खेत में ट्रैक्टर चलाया।
बच्चे तालियाँ बजा रहे थे, बूढ़े लोग हैरानी से देख रहे थे।
ईशर साह के चेहरे पर हल्की उदासी और गर्व दोनों झलक रहे थे।
उन्होंने कहा –
“बेटा, हल-बैल के बिना खेत का दृश्य अधूरा लगता है।”
रामानन्द ने हाथ जोड़कर कहा –
“बाबा, हल हमारी परंपरा है और ट्रैक्टर हमारी ज़रूरत। परंपरा और ज़रूरत दोनों को साथ लेकर चलना होगा।”
🌾 नई तकनीक
रामानन्द साह ने नए बीज लगाए, खाद और सिंचाई के आधुनिक तरीके अपनाए।
गाँव के किसान उनसे पूछते –
“रामानन्द भाई, ये नया बीज सच में अच्छा होगा?”
वे आत्मविश्वास से कहते –
“क्यों नहीं होगा? हमें डरकर नहीं, बदलकर खेती करनी होगी। यही आने वाले समय की राह है।”
धीरे-धीरे उनकी फसल पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन गई। लोग कहने लगे –
“रामानन्द की खेती में चमत्कार है। शायद पढ़ाई का असर है।”
🌌 परिवार की बातें
रात को आँगन में चाँदनी फैली थी। बच्चे खेल रहे थे। पत्नी ने पूछा –
“आपने इतना कर्जा ले लिया है ट्रैक्टर और बीजों के लिए। अगर फसल न हुई तो?”
रामानन्द साह ने उसकी ओर देखते हुए कहा –
“खतरे के बिना तरक्की नहीं होती। अगर हम पुराने डर में जीते रहेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? ये खेत हमारी धरोहर हैं, इन्हें हम आधुनिकता से सँवारेंगे।”
ईशर साह पास ही बैठे सुन रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा –
“बेटा, आज मैं संतुष्ट हूँ। मैंने मिट्टी को नहीं छोड़ा, और तुमने मिट्टी को नई जान दी।”
🌅 नई सुबह
अगले साल जब धान की बाली खेतों में झूमी तो गाँव में उत्सव सा माहौल था।
रामानन्द साह ने बच्चों को खेत दिखाते हुए कहा –
“देखो बेटा, ये सिर्फ अनाज नहीं है। ये हमारी पाँच पीढ़ियों का पसीना है। माधो बाबा ने हल चलाया, मनी बाबा ने पशु पाले, फुल्चन बाबा ने पंपसेट चलाया, ईशर बाबा ने गाँव नहीं छोड़ा… और हमने इन सबको आगे बढ़ाकर नई सुबह बनाई।”
बच्चों की आँखों में चमक थी। वे समझ गए थे कि मिट्टी छोड़ने की नहीं, मिट्टी को सँवारने की ज़रूरत है।
🌅 पीढ़ियों की शिक्षा
एक शाम आँगन में सब इकट्ठा थे। रामानन्द साह ने अपने बेटों और बेटी को देखते हुए कहा –
“बेटा-बेटी,
यह खेत सिर्फ जमीन नहीं है। इसमें माधो बाबा का पसीना है, मनी बाबा की मेहनत है, फुल्चन बाबा का संघर्ष है, ईशर बाबा की जिद है और मेरी नई सोच है।
तुम सब इस धरोहर को आगे बढ़ाओ। कोई पढ़ाई करे, कोई खेती, कोई पशुपालन, कोई व्यापार – पर मिट्टी से नाता मत तोड़ना।”
सभी बच्चे एक स्वर में बोले –
“बाबा, हम वादा करते हैं – इस मिट्टी को कभी नहीं छोड़ेंगे।”
अध्याय 7 : नई पीढ़ी – नए सपने, नई चुनौतियाँ
समय धीरे-धीरे बदलता गया।
रामानन्द साह बूढ़े हो चले थे, लेकिन उनके सपनों की लौ उनके बच्चों और पोते-पोतियों की आँखों में जलने लगी थी।
🧑🌾 रंजीत कुमार के बच्चे – जिम्मेदारी की विरासत
रंजीत कुमार बड़े बेटे होने के कारण उच्च शिक्षा के लिए घर से बाहर निकले जहां
👩🎓 अनीता देवी के बच्चे – शिक्षा और संस्कार
अनीता देवी की संतानें शहर में पली-बढ़ीं, लेकिन वे बार-बार गाँव आतीं।
नानी-नाना के घर में रहकर वे खेतों की हरियाली और दादी के हाथ का खाना याद रखते।
अनीता देवी अपने बच्चों को हमेशा कहतीं –
“जड़ें यहीं हैं, चाहे तुम कितनी भी ऊँचाई क्यों न पा लो।”
📚 संजीत कुमार के बच्चे – पढ़ाई में आगे
संजीत कुमार शिक्षा की राह पर चले थे, इसलिए उनके बच्चों ने भी किताबों को ही जीवन का आधार बना लिया।
वे डॉक्टर, इंजीनियर और अध्यापक बनने के सपने देखने लगे।
गाँव के लोग गर्व से कहते –
“संजीत बाबू के घर से ही गाँव के बच्चों को पढ़ने की प्रेरणा मिलती है।”
🧪 साहेब कुमार के बच्चे – प्रयोग और तकनीक
साहेब कुमार खेती में नए-नए प्रयोग करते थे। उनके बेटे-बेटियों ने मोबाइल और इंटरनेट के जरिए आधुनिक तकनीक सीखी।
उन्होंने गाँव में ड्रिप इरिगेशन और किसान मोबाइल ऐप की चर्चा शुरू कर दी।
लोग हैरान थे कि अब गाँव का लड़का भी खेती को विज्ञान से जोड़ सकता है।
🐄 रविन्द्र कुमार के बच्चे – पशुपालन और व्यवसाय
रविन्द्र कुमार की अगली पीढ़ी ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया। और एक स्कूल के शिक्षक बन बच्चो को ग्रामीणों जीवन और शहरी जीवन के बारे में ज्ञान देते है।
गाँव के लोग कहते –
“रविन्द्र सर बुला कर पुकारते हैं लोग उनको इज्जत और सम्मान देते है।”
✍️ अरविन्द कुमार – कलम से मिट्टी की खुशबू
सबसे छोटे अरविन्द कुमार की अगली पीढ़ी ने किताबों और लेखनी को अपनाया।
उनके बच्चे कहानियाँ और कविताएँ लिखते, जिसमें गाँव, खेत, नदियाँ और किसानों का दर्द झलकता।
गाँव के बुज़ुर्ग कहते –
“ये बच्चे हमारे संघर्ष को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँगे।”
🌄 बदलता समय – बदलती सोच
नई पीढ़ी ने अपने-अपने रास्ते चुने –
- कोई खेतों में हल चलाता रहा।
- कोई किताबों से जीवन रोशन करता रहा।
- कोई व्यवसाय करता।
- कोई कलम से गाँव की कहानी लिखता।
लेकिन सबमें एक समानता थी –
मिट्टी से जुड़ाव।
वे सब जानते थे कि उनकी पहचान सिर्फ गाँव, खेत और मेहनत से ही है।
🌿 पीढ़ियों का संवाद
एक दिन जब पूरा परिवार एक साथ बैठा तो सबसे छोटे बच्चे ने मासूमियत से पूछा –
“दादा, हम सब अलग-अलग काम क्यों करते हैं? कोई किसान, कोई डॉक्टर, कोई अध्यापक, कोई लेखक?”
रामानन्द साह ने मुस्कुराते हुए कहा –
“बेटा,
मिट्टी सिर्फ अन्न ही नहीं देती,
यह सपनों को भी जन्म देती है।
हर बीज एक जैसा नहीं होता –
कोई गेहूँ बनता है, कोई धान, कोई सरसों, कोई आम का पेड़।
हम सब एक ही खेत की फसल हैं, बस हमारे रूप अलग हैं।”
बच्चे की आँखें चमक उठीं।
उसे समझ आ गया कि चाहे रास्ते अलग हों, पर जड़ें एक ही हैं।
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